Description
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। इतना ही नहीं ‘कुमारसंभवम्’ में महाकवि कालिदास ने कहा गया है कि “शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्” अर्थात शरीर ही सभी धर्मो (कर्तव्यों) को पूरा करने का एक मात्र साधन है।
सामान्यतया आजकल आपसी चर्चा में “मैं भी योग करता हूं” ऐसा कहने वाले पर्याप्त लोग मिल जाते हैं, जो योग का अर्थ केवल आसन, प्राणायाम व ध्यान से लेते है वस्तुतः ऋषि पतंजलि ने योग के आठ अंग (अष्टाङ्ग- योग) बताए है, जो यम-नियम का पालन करते हुए आसन, प्राणायाम करने से प्रत्याहार को साधते हुए धारणा, ध्यान, समाधि के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग है।
Paperback ; Pages : 149 ; Author : Shrivardhan

