Description
किसी भी स्थान की जनसंख्या उस स्थान की संस्कृति और सभ्यतागत पहचान की द्योतक होती है। भारत के संदर्भ में जनसंख्या की विविधता और विशालता उसे विशेषीकृत अध्ययन के योग्य बनाती है। साल 1947 में, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, विभाजन की भयानक विभीषिका ने सबको यह विश्वास करने के लिए विवश कर दिया कि जहाँ भी मुसलमान बहुसंख्यक हो गए, अंततः उन स्थानों को भारत से अलग करने का निर्णय लेना पड़ा। प्रस्तुत पुस्तक जनसांख्यिकी के वर्तमान और भविष्य के संकटों को तथ्यों एवं आंकड़ों की सहायता से हमारे सम्मुख एक नग्न सत्य के समान बिखेर कर रख देती है।
इस पुस्तक को व्यवस्थित तरीके से पाँच खंडों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक खण्ड एक चेतावनी के समान प्रतीत होता है। इन खंडों में भारत की जनसंख्या के आंकड़ों को दर्शाया गया है। वर्ष 1961 से 2011 तक हुई जनगणनाओं में चिंताजनक जनसांख्यिकी परिवर्तन देखने को मिले हैं। कई जिलों में, जिनके प्रखण्डवार आँकड़े प्रदत्त किए गए हैं, मुस्लिम जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। इस वृद्धि में जन्म दर के साथ घुसपैठ के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। प. बंगाल, असम, झारखंड, बिहार, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों के कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या में तीव्र वृद्धिृ इस्लामिक गलियारे की आशंका को सत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान कर देती है।
Publisher : Suruchi Prakashan ; Paperback ; Author : Harendra Pratap ; Pages : 234


