Description
श्री जगदेव रामजी इतने निर्मल बाल मन के थे कि बच्चों में बच्चों जैसा, युवक प्रौढ़ों में उनके जैसा या जैसा प्रसंग वैसा ही अपने को बना लेते थे। उनकी वाणी में सरस्वती बोलती थी, जैसे बच्चे उनके पास अपना समझ कर आते थे वैसे ही युवक एवं प्रौढ़ पुरुष एवं ज्ञानी संत भी आते थे। उनका व्यवहार भी उन्हीं के सदृश्य होता था। इसीलिए वे अपनों के अपने जगवेव राम थे। उन्होंने सारा ज्ञान अपने स्वयं की उत्कट इच्छाशक्ति से प्राप्त किया था। किसी के सान्निध्य में बैठकर ज्ञान की सिद्धि प्राप्ति नहीं की थी। जैसे जल की धारा अपने बहाव का मार्ग स्वयं ढूंढ लेती है, वैसे ही पूज्य बालासाहब वेशपाण्डे जी की अनुभवरूपी ज्ञान धारा, संत-महापुरुषों का आशीर्वाद, ज्ञानी जनों का उपवेश एवं संघ की संस्कारधारा का प्रवाह जगवेव राम जी के मानस पटल में प्रवाहमान रहा।
Publisher : Suruchi ; Paperback ; Pages : 88 ; Author : Ramlal Soni


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