Description
यह पुस्तक नारी को केवल परिवार या समाज में निभाई जाने वाली भूमिकाओं अथवा अधिकारों की माँग तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे चेतना, सृजन और संस्कृति की मूल आधारशिला के रूप में प्रस्तुत करती है। वैदिक, औपनिषदि, पौराणिक, रामायण-महाभारत, बौद्ध, जैन, संत और आधुनिक काल तक फैले नारी चिंतन के विविध आयाम इसमें समाहित हैं। पुस्तक में भारतीय दृष्टि से स्त्री-पुरुष की पूरकता, समन्वय और संतुलन पर विशेष बल दिया गया है
Publisher : Gyan Ganga Prakashan ; Paperback ; Pages : 272 ; Editor : Birendra Pandey


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