हिन्दू ईशॉप अद्यतन : माघ मास
- January 28, 2023
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Hindu eShop Updates
हिन्दू ईशॉप पर नए पुस्तकें
राष्ट्रीय नवोत्थान
स्वामी जी ने अपने जीवन के मूलभूत लक्ष्य के बारे बहुदा स्वयं ही कहा है कि “हिन्दुत्व की आधारभूत मान् की नींव पर भारत के प्राचीन गौरव का उत्थान एवम् हिन्दुको व उद्यमशील बनाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य है।”
स्वामी जी ने कहा है कि सेवा और त्याग भारतीयता का युग्मादर्श है। व्यक्तित्व रचना, चरित्र निर्माण, अनुशासन एवम् संगठन आज की महती आवश्यकता है। वे आह्वान पूर्वक कहते हैं “अपने आप को हिन्दू कहने में मुझे गर्व होता है और भगवत् कृपा से मेरे देशवासियों आपको भी ऐसा हो होना चाहिए
स्वामी विवेकानंद : जीवन और संदेश
तुलनात्मक रुप से स्वामी विवेकानन्द का इस धराधाम पर बसेरा थोड़े ही दिनों का रहा। जीवन के संक्षिप्त विस्तार में, उनकी उपलब्धियाँ अत्यधिक थीं। उनका जीवन और संदेश लाखों युव व प्रौढ़ में समान रुप से प्रेरणा का स्रोत रहा। बीज हर्गिज बरगद का पेड़ नहीं होता, यद्यपि सम्भावी रुप से बिज में समाविष्ट होता है। इसी प्रकार आशा की जाती है कि स्वामी विवेकानन्द के इस संक्षिप्त जीवन चरित्र से पाठक को भारत के महान् तूफानी संन्यासी के और अधिक विस्तृत जीवन का अध्ययन करने की प्रेरणा प्राप्त होगी। स्वामीजी के जीवन की विहंगम दृष्टि इस पुस्तिका के पृष्ठों में प्रस्तुत करते हुए हमें परम प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है, क्योंकि इसके द्वारा जनता की सदैव बढ़ती मांग की आवश्यकता की पूर्ति हो रही है।
आप के लिए कुछ पुस्तकें
परम वीर चक्र
पराक्रम दिवस (23 जनवरी 2023) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के 21 द्वीपों का नामकरण , 21 परमवीर चक्र विजेताओं के नाम पर किया| इस किताब को पढ़कर जानिए उन योद्धाओं के बारे में |
यह गोलियों का सामना करनेवाले साहसी वीरों, विपरीत परिस्थितियों में जान पर खेलकर भी अद्वितीय शौर्य प्रदर्शित करनेवाले जाँबाजों, अपने अधिकारियों द्वारा प्रेरित साहसी भारतीय सैनिकों की कहानी है। हालाँकि युद्ध किसी देश की राजनीति का एक विस्तार है, युद्धक्षेत्र में मुकाबला करने की जिम्मेदारी सैनिक की होती है। ‘स्वयं से पहले देश’ वाली संस्कृति में पले भारतीय सेना के सिपाही प्रतिकूल परिस्थितियों को अवसर में बदलते हुए और असंभव को संभव कर दिखाने के साथ विजय प्राप्त करते हुए चुनौतियों का सामना करते हैं। हालाँकि उनके साहसी कारनामों को पुरस्कृत किया जाता है, परंतु कई अन्य बातों को गौर किए जाने की आवश्यकता है कि वह कौन सी चीज है, जो उन्हें ऐसा बनाती है? यह पुस्तक भारतीय सैनिकों की अपने देश के प्रति प्रतिबद्धता और समर्पण को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है।
वीर सावरकर : जो भारत का विभाजन रोक सकते थे
वीर सावरकर” पुस्तक सावरकर जैसे तपोनिष्ठ चिंतक एवं भारत की सुरक्षा के जनक के उस पक्ष को प्रस्तुत करती है, जिससे भारत के विभाजन को रोका जा सकता था।
इस पुस्तक में देश एवं उसकी नई पीढ़ी के समक्ष भारत विभाजन, जोकि तुष्टीकरण की राजनीति के कारण हुआ था, को सत्य कथा को प्रस्तुत करने एवं इतिहास को परिवर्तित करने की उर्वरा है। आज देश को एकजुट बनाए रखने के लिए सावरकरवादी दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
सप्तशील
भारतवर्ष के विविध धर्मशास्त्र, धर्म के परम तत्व को सार्वकालीन, सार्वलौकिक तथा सार्वजनीन मानते हैं। भारतवर्ष के धर्मवेत्ताओं ने, इसीलिए, धर्म को सनातन की संज्ञा दी है। आधार के भेद से, धर्म के परम तत्त्व का परिवर्तन अथवा विपर्यय अचिन्तनीय है।
किन्तु आधार का अनन्त भेद भी संसार का सनातन सत्य है। धर्म के परम तत्व को, व्यावहारिक रूप धारण करने के लिए, आधार के भेदानुकूल ही चरितार्थ होना पड़ता है। इसीलिए भारतवर्ष में मनीषियों ने “स्वधर्म” की कल्पना की है व्यावहारिक जगत में, प्रत्येक आधार, अपने स्वधर्म का आचरण करके ही, धर्म के परम तत्त्व को उपलब्ध करता है।
स्वधर्म का मूल है स्वभाव आधार के स्वभाव-भेद से हो धर्म का परम तत्त्व स्वधर्म के माध्यम से व्यक्त होता है। स्वधर्म के आचरण से आधार का स्वभाव अभिव्यक्ति प्राप्त करता है। स्वभाव की अभिव्यक्ति से आधार की आत्मनिष्ठ शक्ति स्फूर्त होती है। ता शक्तिमान आधार स्वराज्य में स्थित हो जाता है।
जीवन मूल्य – Jeevan Mulya – Set Of 3 Books ( Hindi )
इतिहास, समाजशास्त्र, साहित्य और श्रेष्ठ पुरुषों के चरित्रों का अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि व्यक्ति अथवा समाज की उन्नति के लिए कुछ गुण अत्यावश्यक हैं। वे गुण मानों मानवता की कसौटियाँ हैं। जिसके पास जिस परिमाण में ये गुण होंगे, उस परिमाण में वह व्यक्ति या समाज श्रेष्ठ माना जाता है भगवान राम से लेकर विद्यानिधि बाबासाहेब आंबेडकर पर्यन्त सभी महापुरुषों के जीवन इन्हीं गुणों से परिपूर्ण हैं। इन गुणों की सीढ़ियाँ चढ़े बिना श्रेष्ठता के सिंहासन पर कोई भी आरूढ़ न हो सकेगा, यह सार्वदेशिक और सार्वकालिक सिद्धान्त है।श्रीमद् भगवद्गीता में इन गुणों की महिमा अनेक स्थानों पर अनेक प्रकार से वर्णित है। सोलहवाँ अध्याय तो पूर्णतः इसी विषय को समर्पित है। वहाँ इन गुणों को दैवी सम्पदा कहा गया है। उनमें से कुछ गुणों की व्याख्या प्रस्तुत निबन्धों में की गयी है।






