पंच यज्ञ से परम वैभव Pancha Yagna Se Param Vaibhav

यह यज्ञ-परम्परा वास्तव में कर्तव्य कर्म के रूप में प्रारम्भ हुई। भगवान् कृष्ण ने इसे बहुत अच्छे प्रकार से भगवद्गीता में समझाया है। भगवान् उसमें वर्णन करते हैं कि सारी दुनिया क्या है, कैसे बनी तो भगवान् कहते हैं कि “सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः”। यानी भिन्न-भिन्न मानव समूह जो उत्पन्न हुए, तो सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा हर एक अपने-अपने कर्तव्य कमों के साथ में यह प्रजा है। इसलिए हर एक के अपने-अपने कर्तव्य कर्म को यज्ञ के रूप में कहा गया  है !

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पुस्तक परिचय :

यह यज्ञ-परम्परा वास्तव में कर्तव्य कर्म के रूप में प्रारम्भ हुई। भगवान् कृष्ण ने इसे बहुत अच्छे प्रकार से भगवद्गीता में समझाया है। भगवान् उसमें वर्णन करते हैं कि सारी दुनिया क्या है, कैसे बनी तो भगवान् कहते हैं कि “सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः”। यानी भिन्न-भिन्न मानव समूह जो उत्पन्न हुए, तो सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा हर एक अपने-अपने कर्तव्य कमों के साथ में यह प्रजा है। इसलिए हर एक के अपने-अपने कर्तव्य कर्म को यज्ञ के रूप में कहा गया  है !

लेखक परिचय :

श्री सुरेश सोनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के प्रचारक है । पूर्व में उन्होंने संघ के सह सरकार्यवाह का दायित्व निभाया है

Author

Suresh Soni

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